Women in politics

(Scroll Down for English
Translation)
राजनितिक भागीदारी में
महिलाओं के बढ़ते कदम
राजनीती मेंमहिलाओंका
शशक्तिकरण और राजनितिक
दलोंमेंउनकी निर्णायक
भागीदारी भारतीय
इतिहास का एक रोचक और
निराशाजनक पहलु रहा हैं। रोचक
इसलिए क्योंकि भारतीय
राजनीती नें
समय-समय पर महिला नेताओं
को जरूर देखा है मगर
कभी भी महिलाओं की एक
व्यापक एवं प्रासंगिक
सक्रियता नहीं दिखी। और यह
बात फ्रंटएंड-बैकएंड, दोनों प्रकार
के राजनीती के संदर्ब में है।
सुचेता कृपलानी, अरुणा असफ
अली, ब्रिंदा करात,
ममता बनर्जी, मायावती, और
जयललिता जैसे कुछ
अपवाद छोड़ दें तो शायद
ही कोई महिला भारत में अपने
बल बूते पर एक राजनयिक
की छवी बना पाई हो।
ज्ञात हो की इंदिरा,
सोनिया, शीला, सुषमा,
वसुंधरा, प्रतिभा,
राबड़ी सरीखें नाम भारतीय
राजनीती में
सिर्फ इसलिए जुड़ पाएं क्यूंकि उन
नामों के पीछे एक पितृसत्तात्मक
सोंच हावी थी, एक कुलनाम
जुडा
था। संरक्षण्कर्ता के रूप में, एक
बपौती की तरह। और
यही स्थिति छेत्रीय स्तर पर
काबिज हैं जहाँ कई
दफा महिलायें मुखिया, पार्षद,
या विधायक तो बनती हैं मगर
अधिकारिक निर्णय उनके पति लेते
है।
गौरतलब है की पत्नियों के चुनाव
जितने के बाद यह पति खुद
को मुखियापति,पार्षदपति
सरीखे उपाधि
से नवाज़ते हैं।
कई मायनों में इस बपौती के
वर्चस्व को ख़त्म करने के लिए
ही महिला आरक्षण बिल
को प्रस्तावित
किया गया था जिसमें
लोकसभा के ३३ प्रतिशत
सीटों को महिला को लिए
आरक्षित किया जाना था।
मार्च २०१० में राज्यसभा में यह
प्रस्ताव पारित होने के बावजूद
आज तक यह लोकसभा में लंबित है।
जिसका मुख्य कारण राजनितिक
दलों की वही पितृसत्तात्मक
सोंच है जो उनके कार्यकर्ताओं को
घबड़वा देता है महिलाओं के
प्रतिस्पर्धा से।
मगर मान लीजिये की कल अगर यह
बिल संसद में पारित
हो भी जाये तो क्या कोई
राजनीतिक दल यह
सुनिश्चित कर
पायेगा की महिलाओं
की भागीदारी सिर्फ संसद में
ही नहीं बल्कि उनके खुद के संगठन में
भी बढ़ेगी। पार्टी और सरकार के
ऊँचे पदों पर बैठकर स्वायतता से
महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने के
लिए।
तटस्थ रूप से देखने पर इस श्रेणी में एक
भी मुख्यधारा का राजनितिक
दल नहीं नज़र आता है।
और शायद यहीं से शुरू होती है एक
नए प्रकार की राजनीती में
महिलाओं
की भागीदारी बढ़ाने
की कवायद।
इस कवायद में राजनितिक
पदार्पण करने वाली आम
आदमी पार्टी एक अहम्
भूमिका निभा रही है।
युवतियों और महिलाओं को अहम्
मुद्दों पर काम करने
की जिम्मेवारी सौंप कर।
जहाँ एक ओर २७ वर्षीय
अस्वती दिल्ली में
मीडिया संपर्कता और
प्रत्याशियों के चुनाव में
अन्तर्ग्रस्त हैं, और अरविन्द को समय-
समय पर सुझाव देती रहती हैं
तो वहीँ पार्टी नें २६ वर्षीय
शालू
को प्रशासनिक
खर्चों का ब्यौरा सँभालने
की जिम्मेवारी सौंपी है।
सरिता जमीनी अस्तर पर
पार्टी के
लिए दिल्ली के उत्तरी-पूर्व छेत्र
का कमान संभाल रही हैं और बेहद
कम उम्र की अर्शी पार्टी के
छात्र
समिति का काम देख रहीं हैं।
मध्यम वर्गीय परिवार
सेआनेवाली इन युवतियोंमें
राजनीती केप्रति एक अलग
प्रकार का उत्साह
देखने को मिलता हैजो शायद
भारतीय इतिहास मेंअभुत्वपुर्व है।
अस्वती कहती हैं “यह मेरेजीवन का
सबसे बेहतरीन दौर है जहाँ मैं
राजनितिक
गतिविधियों को इतने
सक्रियता से देख पा रही हूँ।”
एक ओर दिल्ली में ये
“ट्वेंटी समथिंग”
युवतियाँ भारतीय
राजनीती में एक नया अध्याय
जोड़ रहीं है तो
वहीँ विदेशों में रह
रहीं प्रवासी महिलाओं नें
इन्टरनेट के ज़रिये पार्टी के
प्रचार-प्रसार सम्बंधित कार्यों
में स्वैच्छिक रूप से मदत कर रही हैं।
संगठन-संबंधी मसलों की जानकार
शालिनी गुप्ता नें शुरुआती
दौर में पार्टी के अन्दर संगठन
को स्थापित करने में महत्वपूर्ण
योगदान दिया और
अभी पार्टी के
ग्लोबल समर्थको के साथ तीस से
ज्यादा देशों में पार्टी से
सम्बंधित
कार्यक्रमों को क्रियान्वित
करवा रही हैं। वह पार्टी ईमेल
ग्रुप में लोगों के संवाद
को सही दिशा देती हैं
तो वहीँ सुकन्या भद्रा विश्व
भर के आप समर्थकों को ईमेल ग्रुप में
जोडती हैं।
सुकन्या शिकागो छेत्र
की मीडिया संयोजक हैं और
लोगों के सुझाव और
प्रश्नों को पार्टी मुख्यालय तक
पहुँचाती हैं ताकि पार्टी इन्हें
अपने कार्यशैली में
क्रियान्वित कर सके।
अमरीका की चैत्रा पडसलगी ने
शिकागो शहर में बसे भारतीय
लोगों से समर्थन जुटाने का काम
संभाला है। पारिवारिक
जिम्मेवारियों के बावजूद
उनका एक सकारात्मक
राजनीती के तरफ गजब का
रुझान है। वह कहती हैं की “मैं
नहीं चाहती की मेरे पति घर के
कामों में हाथ बटाएँ मगर मैं यह
जरूर चाहूंगी
की मेरे इस मनोभाव का उनके
जीवन में एक स्थान हो।”
ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर
की नमिता पाण्डेय पार्टी के
ग्लोबल ग्रुप के मीडिया टीम
की
महत्वपूर्ण सदस्य है और ऑस्ट्रेलिया-
अमरीका के
प्रवासी भारतीयों के लिए
प्रकाशित पत्रिकाओं में
नियमित तौर पर लेख लिखती हैं।
उनके लेखों में अमूमन पार्टी के
विचार सम्मिलित रहते हैं।
हो सकता है की इन महिलाओं
को अभी राजनीतिक दाँव-पेंच
और उसकी पेंचीदगी को समझने में
समय
लगे मगर इसमें दो राय
नहीं की उन्होंने अपने दृड़ संकल्प के
जरिये एक नए कल की शुरुआत की है।
रही
बात आम
आदमी पार्टी की तो उसे
अभी काफी लम्बा सफ़र तय
करना है। और उसे इस सफ़र में
महिलाओं
के लिए सीट बिना आरक्षण के
ही बरकरार रखनी होगी। मगर
निश्चित तौर पर महिलाओं
की राजनितिक
संग्लिप्ता बढ़ाने के लिए यह एक
अच्छी पहल है। महिला सशक्तिकरण
के दिशा में एक महत्वपूर्ण
कदम है।
The involvement of women in the
Indian political parties has been an
interesting but
disappointing aspect of Indian
politics. Interesting because the
Indian polity has witnessed
some ornamental and dummy
women figureheads from time to
time but there has always
been a question mark on relevant
and extensive engagement of
women in Indian political
system. And it can be readily
applied to both front end and
backend aspect of the politics.
Baring a few exceptions like
Sucheta Kripalani, Aruna Asaf Ali,
Brinda Karat, Mamta
Banerjee, Mayawati, Jaylalita it has
been a rarity to witness women
creating a political
identity for herself solely on the
basis of her capabilities. It is no
secret that names like
Indira, Sonia, Sheila, Sushma,
Vasundhra, Pratibha, Rabri could
only figure in our political
system due to a certain kind of
patriarchal thought; a patronage –
a lineage.
The scenario at localized junctures
of polity in small towns, tehsils and
villages is more
grisly where even if a women ends
up becoming a sarpanch, a
councilor, or a MLA; most
of the decision making is done by
her husband and other male
members of her family.
Amusingly many such husbands of
these elected women
representatives give themselves
titles like mukhiyapti, parshadpati
or vidhayakpati – which literally
means husband of the
Mukhiya, Councilor, MLA etc.
To a large extent the women
reservation bill to reserve 33 % of
Loksabha seats for
women was conceptualized and
introduced in the parliament to
eradicate this continued
blatant patriarchal influence and to
improve the engagement of women
in the Indian
political arena. However the bill is
still pending to be passed in the
Lower house after
being cleared in the Upper House
of the Parliament since March
2010.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: